"जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।"
श्री
भगवद गीता 4:7
भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य वचन
अध्याय 4, श्लोक 7
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अर्थ और विश्लेषण

भगवद गीता के इस महत्वपूर्ण श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतार के रहस्य को प्रकट करते हैं। यह श्लोक संसार में दैवीय हस्तक्षेप के सिद्धांत और धर्म की स्थापना के लिए भगवान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि:

1. धर्म की रक्षा का वचन: भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जब भी धर्म (न्याय, सत्य, नैतिकता) का पतन होता है और अधर्म (अन्याय, झूठ, अनैतिकता) बढ़ता है, तब वे स्वयं प्रकट होते हैं। यह भगवान का संसार के प्रति वचन है।

2. अवतार का उद्देश्य: भगवान के अवतार का मुख्य उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश है। यह श्लोक हमें बताता है कि भगवान का अवतार मनुष्य के कल्याण और नैतिक व्यवस्था की रक्षा के लिए होता है।

3. निरंतर सुरक्षा: "जब-जब" शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि भगवान की रक्षा निरंतर और सतत है। वे केवल एक बार नहीं, बल्कि हर युग में, हर समय धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

यह श्लोक विशेष रूप से वर्तमान समय में प्रासंगिक है जब नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। यह हमें आश्वस्त करता है कि न्याय और धर्म की अंततः विजय होती है और दैवीय शक्ति हमेशा धर्म का साथ देती है।

भगवान श्रीकृष्ण

श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय और पूज्य देवताओं में से एक हैं। उन्हें विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है। श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में मथुरा में हुआ था और उनका जीवन दर्शन, प्रेम, कर्तव्य और न्याय का अनूठा संगम है।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने भगवद गीता का उपदेश दिया, जो मानव जाति के लिए एक सार्वभौमिक दार्शनिक ग्रंथ बन गया। उनकी लीलाएँ, शिक्षाएँ और जीवन दर्शन करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं। श्रीकृष्ण को प्रेम, करुणा, न्याय और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

अवतार
विष्णु के आठवें अवतार
जन्म स्थान
मथुरा, भारत
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
कोट्स संख्या
SKY पर 250+ कोट्स

व्यावहारिक अनुप्रयोग

नैतिक जीवन में

व्यक्तिगत जीवन में सत्य और नैतिकता का पालन करें। जब भी अनैतिकता देखें, उसका विरोध करें। धर्म की रक्षा में अपना योगदान दें।

सामाजिक जिम्मेदारी

समाज में अन्याय और अधर्म के विरुद्ध खड़े हों। सामाजिक समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाएँ। धर्म की स्थापना में योगदान दें।

आध्यात्मिक दृष्टि

भगवान के इस वचन पर विश्वास रखें कि अंततः न्याय की जीत होती है। कठिन समय में भी धर्म का पालन करें और भगवान पर विश्वास बनाए रखें।

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